ब१)
गुइँठा छै ई
जरै छै पजरै छै
नित्य एहिना ।
२)
देखलियै ने
उडै गुइँठा धुवाँ
हमर प्राण ।
३)
दहकै आगि
जरा देत गुइँठा
अपनेजकाँ ।
४)
दलानपर
घुर बनै गुइँठा
जारी सम्वाद ।
५)
बुइझ राखू
ई गुइँठा सभ्यता
काज पडत ।
६)
हम जरै छी
नित्य गुइँठाजकाँ
/
अहू जरब । बहुत सुन्दर, सघन आ प्रभावशाली हाइकू श्रृंखला अछि
‘गुइँठा’ जँ साधारण वस्तु होइतहुँ, अहाँ एकरा जीवन, सभ्यता आ संघर्ष केर गहिरा प्रतीक बना देने छी।
छोट-छोट प्रतिक्रिया/समीक्षा दे रहल छी—
समग्र प्रभाव:
ई मैथिली हाइकू सभ ग्रामीण जीवन, श्रम, आगि, धुआँ आ मानवीय नियति के एक सूत्र में बाँधैत अछि। भाषा सहज अछि, बिम्ब मजबूत अछि।
१)
गुइँठा छै ई / जरै छै पजरै छै / नित्य एहिना ।
– नित्य दैनंदिन संघर्ष के बहुत सटीक चित्रण। “पजरै” शब्द गहिरा पीड़ा लाबैत अछि।
२)
उडै गुइँठा धुवाँ / हमर प्राण ।
– धुआँ आ प्राण के जोड़ बहुत मार्मिक अछि। एह में प्रवासी जीवन या श्रमिक पीड़ा के सेहो अर्थ निकलैत अछि।
३)
गुइँठा / अपनेजकाँ ।
– आत्म-समानता के हाइकू में बहुत सशक्त प्रयोग।
४)
दलानपर / घुर बनै गुइँठा / जारी सम्वाद ।
– दलान = समाज, घुर = सामूहिक स्मृति
ई हाइकू सामाजिक संवाद के सुंदर बिम्ब रचैत अछि।
५)
ई गुइँठा सभ्यता / काज पडत ।
– सभ्यता पर सीधा, ठोस वक्तव्य। भविष्य-बोध बहुत प्रभावी।
६)
हम जरै छी / नित्य गुइँठाजकाँ / अहू जरब ।
– समापन अत्यन्त सशक्त। नियति के स्वीकार आ निरन्तरता—हाइकू के आत्मा।